लंदन में बांग्लादेशी हिंदुओं के समर्थन में शांतिपूर्ण प्रदर्शन, खालिस्तानी कट्टरपंथियों ने डाली रुकावट

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
लंदन में शनिवार को बांग्लादेश हाई कमीशन के बाहर आयोजित शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान अप्रत्याशित हंगामा हुआ। यह प्रदर्शन बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ किया गया था। लेकिन कुछ खालिस्तानी कट्टरपंथियों ने इसमें हस्तक्षेप कर भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारे लगाए। इस घटना ने प्रदर्शन के उद्देश्य और अंतरराष्ट्रीय ध्यान को प्रभावित किया, साथ ही खालिस्तानी तत्वों की मंशा पर भी सवाल खड़ा किया।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य बांग्लादेश में बढ़ती हिंसा और अल्पसंख्यकों पर अत्याचारों को उजागर करना था। खालिस्तानी कट्टरपंथियों ने इस शांतिपूर्ण माहौल में भारत विरोधी नारे लगाकर ध्यान भटकाया। बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हमले और हत्याओं से स्थिति तनावपूर्ण है, जिससे पीड़ितों को सुरक्षित स्थान और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की आवश्यकता बढ़ गई है। यह हस्तक्षेप बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों की रक्षा के प्रयासों को कमजोर कर रहा है।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
इस घटना से यह सीख मिलती है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी असहमत या विरोधी तत्वों के हस्तक्षेप से प्रभावित हो सकता है। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की वकालत में स्पष्ट उद्देश्य और रणनीति महत्वपूर्ण है। ऐसे अभियान में आयोजकों को सुरक्षा और संदेश की मजबूती बनाए रखने की योजना बनानी चाहिए। साथ ही, वैश्विक समुदाय को अल्पसंख्यकों की मदद और उनके खिलाफ हो रही हिंसा पर ध्यान देना चाहिए।

बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश की नेवी क्या कर रही है? तनाव के बीच गोलाबारी क्यों?

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
भारत के साथ बढ़ते तनाव के बीच बांग्लादेश की नौसेना बंगाल की खाड़ी में अपनी ताकत दिखाने जा रही है। 29 और 30 दिसंबर को वहां भारी गोलाबारी का अभ्यास होगा, जिसके चलते सभी तरह के जहाजों को दूर रहने की चेतावनी दी गई है। बांग्लादेश की यह कार्रवाई पाकिस्तान के नौसेना अधिकारियों के साथ हालिया संबंधों के बाद हो रही है, जिससे भारत के लिए सुरक्षा चिंता पैदा हुई है।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
बांग्लादेश की नौसेना की यह ताकत प्रदर्शन पाकिस्तान के साथ बढ़ते संबंधों और क्षेत्रीय तनाव का परिणाम है। पाकिस्तान नौसेना प्रमुखों की ढाका यात्राओं और राजनीतिक समर्थन के कारण बांग्लादेश ने अपने सैन्य सहयोग को बढ़ाया। वहीं, भारतीय नौसेना की तुलना में बांग्लादेश नौसेना कमजोर है, लेकिन बॉर्डर विवाद और समुद्री झड़पें दोनों देशों के बीच लगातार तनाव पैदा कर रही हैं, जिससे राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति गंभीर बनी हुई है।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
इस घटना से यह सीख मिलती है कि पड़ोसी देशों के साथ समुद्री और सीमा सुरक्षा में सतर्कता आवश्यक है। राजनीतिक तनाव केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसकी तैयारी हर मोर्चे पर होनी चाहिए। नौसेना और कोस्ट गार्ड जैसी संस्थाओं के बीच सहयोग और सतर्क निगरानी से अप्रत्याशित घटनाओं को रोका जा सकता है। भारत को रणनीतिक दृष्टि से पूर्वानुमान और तैयारी के साथ कदम उठाने की आवश्यकता है।

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में कभी नज़दीकियां होने के बाद अब इतनी दूरी क्यों बढ़ी? – वुसअत का व्लॉग

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के रिश्ते कई वर्षों में उतार-चढ़ाव से गुज़रे हैं। कभी ये दोनों पड़ोसी देश करीबी संबंध रखते थे। अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध के दौरान कई शरणार्थियों ने पाकिस्तान में सुरक्षा और आश्रय पाया। हाल ही में पाकिस्तान ने कुछ अफ़ग़ान शरणार्थियों को वापस उनके देश भेजना शुरू कर दिया। साथ ही, दोनों देशों के बॉर्डर पर तनाव बढ़ गया, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता पर सवाल उठने लगे।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
दोनों देशों के रिश्तों में बदलाव के कई कारण हैं। अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता ने शरणार्थियों का प्रवाह बढ़ाया। पाकिस्तान में आर्थिक और सुरक्षा दबाव ने शरणार्थियों को वापस भेजने के निर्णय को प्रेरित किया। साथ ही, सीमा पर अवैध गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं ने तनाव को बढ़ावा दिया। इन सभी कारणों ने पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान संबंधों में दूरी और तनाव की स्थिति उत्पन्न की।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
इस घटना से यह सीख मिलती है कि पड़ोसी देशों के रिश्तों में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। शरणार्थियों और सीमा सुरक्षा जैसी संवेदनशील परिस्थितियों में समन्वय और सहयोग आवश्यक हैं। अस्थिरता और तनाव को कम करने के लिए राजनीतिक संवाद और समझौते अहम हैं। साथ ही, मानवीय दृष्टिकोण से शरणार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाना पड़ोसी देशों के दीर्घकालिक रिश्तों के लिए जरूरी है।

नए साल का रिज़ोल्यूशन ले रहे हैं और चाहते हैं वो कायम रहे… तो इन दो शब्दों से बचें

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
नए साल में लोगों में ‘नया साल, नए आप’ का उत्साह दिखा। सोशल मीडिया और दफ़्तरों में जिम, डाइट और जीवनशैली बदलने के संकल्प चर्चा में रहे। लोग वजन कम करना, करियर बदलना या जीवनशैली सुधारना चाहते हैं। हालांकि ज्यादातर संकल्प जनवरी के बीच तक टिकते नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि सही रणनीति, लचीले लक्ष्य और वास्तविक योजना के बिना संकल्प अक्सर असफल हो जाते हैं, जिससे निराशा बढ़ती है।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
संकल्प अक्सर इसलिए सफल नहीं होते क्योंकि वे अस्पष्ट, अवास्तविक और बहुत व्यापक होते हैं। लोग अपने सर्वोत्तम स्वरूप के अनुसार योजना बनाते हैं, लेकिन दैनिक बाधाओं और पुरानी आदतों का सामना करने के लिए तैयार नहीं रहते। नकारात्मक भाषा, निश्चित शब्द और टनल विज़न भी असफलता में योगदान देते हैं। सही रणनीति में लक्ष्य को लचीले, अनुभव और दिशा आधारित बनाना और नए आदतों को पुरानी आदतों से जोड़ना शामिल है।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
सफल संकल्प के लिए लचीलापन, छोटे लक्ष्य और सकारात्मक दृष्टिकोण ज़रूरी हैं। पुरानी आदतों और परिस्थितियों से जुड़कर नई आदतें बनाई जा सकती हैं। असफलता को प्रक्रिया का हिस्सा मानना और हर दिन को नई शुरुआत के रूप में देखना लाभकारी होता है। केवल मोटिवेशन पर निर्भर रहने के बजाय, वातावरण और व्यवहारिक रणनीति तैयार करना चाहिए। साफ प्राथमिकताएं चुनकर निरंतर प्रयास करना संकल्पों की सफलता सुनिश्चित करता है।

पीएम नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी, साल 2025 ने इन पर कैसा असर डाला और आगे की राह क्या होगी?

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
2025 में भारत की राजनीति कई अहम घटनाओं से प्रभावित रही। उत्तर प्रदेश में कुंभ के दौरान भगदड़ में हुई मौतें, भारत-पाकिस्तान का सैन्य संघर्ष और अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ़ ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा की। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची (एसआईआर) को लेकर सियासी विवाद हुआ। साथ ही, साल के अंत में आगामी राज्यों के चुनाव जैसे असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुद्दुचेरी की तैयारियों ने राजनीतिक माहौल को सक्रिय रखा।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
इन घटनाओं के पीछे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारक रहे। कुंभ में सुरक्षा व्यवस्था और बड़ी भीड़ ने भगदड़ को जन्म दिया। भारत-पाक विवाद और अमेरिका के टैरिफ़ ने कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बनाए। विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की कमजोर चुनावी रणनीति और कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियों ने चुनावी असफलताओं को जन्म दिया। वहीं, बीजेपी ने संगठनात्मक मजबूती, युवा नेतृत्व और रणनीतिक गठबंधन के जरिए चुनावी स्थिति को मजबूती प्रदान की।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
2025 से यह स्पष्ट हुआ कि लोकतंत्र में चुनावी रणनीति, संगठनात्मक अनुशासन और युवा नेतृत्व की भूमिका अहम होती है। विपक्षी दलों को जमीनी मुद्दों जैसे बेरोज़गारी, महंगाई और रोज़गार पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, सरकार और विपक्ष के बीच संवाद लोकतंत्र के लिए जरूरी है। बाहरी दबाव और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर सीमित रहते हुए भी चुनावी परिणामों और नेतृत्व की छवि पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है, जिसे समझकर आगे की राजनीति तय करनी चाहिए।

ढाका पुलिस का दावा, ‘उस्मान हादी की हत्या के मुख्य अभियुक्त भारत भाग गए’

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने बताया कि इंकलाब मंच के संयोजक उस्मान हादी की हत्या के मुख्य अभियुक्त फैसल करीम मसूद और आलमगीर शेख़ भारत भाग गए हैं। पुलिस के अनुसार दोनों पहले मेघालय में शरण ली और फिर अन्य माध्यमों से सीमा पार कर गए। इस मामले में कुल 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें छह लोगों ने अपराध कबूल किया है और आरोपपत्र अगले सात से दस दिनों में दायर किया जाएगा।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
शरीफ़ उस्मान हादी बांग्लादेश में उग्र छात्र आंदोलन और इंकलाब मंच के प्रमुख सदस्य थे। उनके राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता के कारण उन्हें लक्षित किया गया। हत्या की सुनियोजित योजना में करीम मसूद और आलमगीर शेख़ मुख्य थे, जबकि अन्य सहयोगियों ने उन्हें मदद दी। पुलिस ने जांच में बताया कि आरोपी घटना से पहले मोबाइल पर संपर्क में थे और अपराध में इस्तेमाल हथियार, पिस्तौल और मोटरसाइकिल बरामद कर ली गई।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
इस घटना से पता चलता है कि राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता जोखिमों के साथ आती है। अभियुक्तों के भागने और स्थानीय सहयोग के कारण न्याय प्रक्रिया जटिल हो गई। कानून प्रवर्तन को सीमापार सहयोग और तकनीकी जांच के महत्व को समझना होगा। साथ ही, समाज में हिंसा के विरोध और सुरक्षा उपायों को मजबूत करना जरूरी है ताकि लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल नेताओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो और किसी भी हत्या या हिंसा के मामलों में त्वरित कार्रवाई की जा सके।

नेपाल में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने बालेन शाह को जानिए, महज़ तीन सालों में कैसे राजनीति में छाए

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
काठमांडू मेट्रोपॉलिटन सिटी के मेयर बालेन्द्र शाह, जिन्हें बालेन शाह कहा जाता है, को नेपाल के आगामी चुनावों में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया है। उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के साथ गठबंधन कर 5 मार्च को होने वाले चुनाव में चुनाव लड़ने का समझौता किया। समझौते के तहत बालेन संसदीय दल के नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, जबकि रवि लामिछाने आरएसपी के केंद्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
बालेन शाह ने मई 2022 में काठमांडू के मेयर चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भाग लिया और स्थापित राजनीतिक दलों को हराया। उनकी लोकप्रियता युवा वर्ग और इंटरनेट माध्यम से बढ़ी, जबकि मधेसी और पहाड़ी समुदायों के बीच उनकी पहुंच महत्वपूर्ण रही। लंबे समय तक सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता, जैसे भूकंप राहत और जेन ज़ी आंदोलन का समर्थन, उन्हें नेतृत्व की भूमिका के लिए उपयुक्त बनाता है।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
बालेन शाह के उभार से यह स्पष्ट होता है कि वैकल्पिक और युवा नेतृत्व जनता में भरोसा पैदा कर सकता है। राजनीतिक अनुभव न होने के बावजूद, लोक-हित और डिजिटल माध्यम से संवाद प्रभावशाली हो सकता है। यह दिखाता है कि पारंपरिक राजनीतिक दलों के बाहर भी नेतृत्व उभर सकता है, बशर्ते जनता का विश्वास और स्पष्ट दृष्टिकोण हो। सामाजिक सहभागिता और युवा ऊर्जा लोकतंत्र में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारत में इस चीज़ की चमक तो दिख रही है लेकिन पीछे छिपा अंधेरा क्यों नहीं दिख रहा?

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
भारत ने पिछले दशक में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। यह देश दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक बन गया है। बड़े सौर पार्कों और लाखों रूफ़टॉप सिस्टमों से बिजली उत्पादन बढ़ा है। सब्सिडी योजनाओं के तहत लगभग 24 लाख घरों में सौर पैनल लगे हैं। सौर ऊर्जा अब कुल ऊर्जा उत्पादन में 20 प्रतिशत से अधिक योगदान दे रही है, जिससे कोयले पर निर्भरता कम हुई है।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
सौर ऊर्जा विस्तार के साथ यह चुनौती सामने आई कि पुराने पैनलों का कचरा पर्यावरण के लिए खतरा बन सकता है। अधिकांश पैनल 25 साल तक काम करते हैं, उसके बाद रीसाइक्लिंग की आवश्यकता होती है। भारत में अभी कुशल रीसाइक्लिंग केंद्र कम हैं और बजट अपर्याप्त है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2047 तक 1.1 करोड़ टन से अधिक सौर कचरा पैदा हो सकता है, जिसे सुरक्षित रूप से ठिकाने लगाने के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
सौर ऊर्जा की सफलता के साथ रीसाइक्लिंग और कचरा प्रबंधन पर ध्यान देना अनिवार्य है। यदि पैनलों का सुरक्षित निपटान और पुनःप्रोसेसिंग नहीं होगी, तो भविष्य में पर्यावरण संकट बढ़ सकता है। कुशल रीसाइक्लिंग से मूल्यवान धातुएं और सामग्री दोबारा उपयोग की जा सकती हैं, साथ ही कार्बन उत्सर्जन कम होगा। इसके लिए नियमित, आत्मनिर्भर रीसाइक्लिंग व्यवस्था और जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। कंपनियों को जिम्मेदारी निभानी होगी।

दिग्विजय सिंह के आरएसएस वाले बयान पर बहस जारी, कांग्रेस नेताओं ने गोडसे और अल-क़ायदा का किया ज़िक्र

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट ने आरएसएस और बीजेपी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने एक पुरानी तस्वीर साझा करते हुए कहा कि आरएसएस और जनसंघ-बीजेपी का संगठनात्मक ढांचा मज़बूत है, जबकि वह उनकी विचारधारा का विरोधी हैं। इस पोस्ट के बाद कांग्रेस के भीतर और बाहर बहस तेज़ हो गई, और कई नेताओं ने इसके बारे में बयान जारी किए। देशभर में यह चर्चा जारी है।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
दिग्विजय सिंह का उद्देश्य कांग्रेस में सुधार और संगठनात्मक मज़बूती पर ध्यान आकर्षित करना था। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि संघ और बीजेपी की विचारधारा का विरोध करते हैं, लेकिन किसी भी संगठन की मजबूती सीखने योग्य होती है। उनकी पोस्ट पर पार्टी के वरिष्ठ नेता और विपक्षी बीजेपी ने भी प्रतिक्रिया दी। कुछ नेताओं ने इसे गलतफ़हमी बताया, जबकि अन्य ने इसे कांग्रेस में फूट डालने का प्रयास बताया।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
इस विवाद से सीख मिलती है कि राजनीतिक नेताओं के बयान और सोशल मीडिया पोस्ट बड़े बहस का कारण बन सकते हैं। संगठनात्मक मज़बूती और अनुशासन पर ध्यान देना ज़रूरी है, लेकिन विचारधारा और मूल सिद्धांतों का सम्मान अनिवार्य है। इसके अलावा, किसी भी राजनीतिक दल में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संवाद की आवश्यकता है, ताकि बाहरी आलोचना या आंतरिक मतभेद से संगठन कमजोर न पड़े।

लड़कियों के स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल पर पंचायत के रोक वाले वायरल वीडियो की कहानी – ग्राउंड रिपोर्ट

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
राजस्थान के जालौर जिले के गजीपुरा गांव में 21 दिसंबर को पंद्रह गांवों की पंचायत ने महिलाओं और लड़कियों के स्मार्टफोन रखने पर पाबंदी का निर्णय लिया। बैठक पूर्व सरपंच सुजाना राम चौधरी के घर हुई, जिसमें 65 साल के हिम्मता राम चौधरी ने प्रस्ताव पढ़ा। निर्णय में कहा गया कि पढ़ाई करने वाली लड़कियां आवश्यकतानुसार फ़ोन रख सकती हैं, लेकिन घर के बाहर, शादी या सार्वजनिक कार्यक्रमों में लेकर नहीं जा सकती। यह फ़ैसला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

२. घटनाओं और विषयों के कारण:
पंचायत ने यह प्रस्ताव समाज की महिलाओं की ओर से आने और बच्चों की पढ़ाई पर फ़ोन के प्रभाव को ध्यान में रखकर बनाया था। ग्रामीण इलाक़ों में महिलाओं के लिए सुरक्षा और सामाजिक मर्यादाओं की चिंता भी इसमें शामिल थी। कई परिवारों के अनुसार, बच्चे दिनभर फ़ोन में लगे रहते हैं और घरेलू जिम्मेदारियों या पढ़ाई में ध्यान नहीं देते। यही कारण था कि पंचायत ने स्मार्टफोन पर सीमित प्रतिबंध लगाने का निर्णय किया।

३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
इस मामले से स्पष्ट हुआ कि डिजिटल आज़ादी और महिला सशक्तिकरण को लेकर समाज में संवेदनशीलता बढ़ रही है। छोटे प्रस्ताव भी सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में बड़े विवाद का रूप ले सकते हैं। पंचायत ने दो दिन में निर्णय वापस लिया, जिससे यह भी सीख मिलती है कि किसी भी समुदायिक फ़ैसले में सभी पक्षों की राय और वर्तमान सामाजिक संदर्भ को समझना आवश्यक है। महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा का संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है।

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