बिहार के कई ज़िलों में ब्रेस्ट मिल्क में मिला यूरेनियम, विशेषज्ञों का क्या है कहना

0
2

(1). घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:-

बिहार के छह ज़िलों—भोजपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, कटिहार और नालंदा—में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में यूरेनियम पाया गया है। 17 से 35 वर्ष की 40 महिलाओं पर किए गए इस अध्ययन में दूध के सैंपल की जांच एलसी–आईसीपी–एमएस मशीन से की गई। शोध में सबसे ज़्यादा यूरेनियम कटिहार की महिला में 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर और सबसे कम भोजपुर की महिला में मिला। 35 बच्चों के ब्लड सैंपल में भी 70% बच्चों के खून में यूरेनियम पाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार ये नॉन-कार्सिनोजेनिक स्वास्थ्य जोखिम जैसे गुर्दे, नर्वस सिस्टम व मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। यह अध्ययन महावीर कैंसर संस्थान, दिल्ली AIIMS और NIPER सहित पाँच संस्थानों की टीम ने अक्टूबर 2021 से जुलाई 2024 तक किया।


(2). घटनाओं और विषयों के कारण:-

विशेषज्ञों का मानना है कि मां के दूध में मिला यूरेनियम संभवतः भूजल के माध्यम से शरीर में पहुंचा होगा, क्योंकि बिहार के कई ज़िलों के ग्राउंडवॉटर में पहले से ही आर्सेनिक, फ्लोराइड, मैग्नीज़, मरकरी और यूरेनियम जैसे तत्व पाए जाते रहे हैं। अलग-अलग शोधों में बिहार के 11 ज़िलों—जैसे गोपालगंज, सिवान, सारण, वैशाली, नवादा, नालंदा, कटिहार आदि—के पानी में यूरेनियम की उपस्थिति दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार दूषित भूजल, फसल चक्र (फूड चेन) और पीने का पानी इस समस्या का मुख्य स्रोत हो सकते हैं। जल-गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 में भी राज्य के कई सैंपल में विभिन्न हानिकारक धातुएं मिली थीं, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्रदूषित पानी एवं पर्यावरणीय कारक इस स्थिति के प्रमुख कारण हैं।


(3). घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:-

इस घटना से सबसे बड़ा सबक यह है कि जल की गुणवत्ता और पर्यावरणीय सुरक्षा को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ लोग भूजल पर निर्भर हैं। मां के दूध में यूरेनियम मिलना चिंता का विषय है, इसलिए सरकार, स्वास्थ्य संस्थान और वैज्ञानिक समुदाय को यह सुनिश्चित करना होगा कि पीने का पानी सुरक्षित हो और नियमित जाँच की व्यवस्था हो। महावीर कैंसर संस्थान द्वारा इस अध्ययन को व्यापक रूप से बढ़ाने की योजना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही, आम जनता को जागरूक होकर पानी की गुणवत्ता की जांच करवानी चाहिए और आवश्यक होने पर फ़िल्टर या वैकल्पिक जल-स्रोत अपनाने चाहिए। प्रारंभिक चरण में ही बीमारी की पहचान और रोकथाम, भविष्य के जोखिमों को कम कर सकती है।

LEAVE A REPLY