रूस को फिर जी-8 में लाने की कोशिश, क्या यह पुतिन की जीत है?

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(१). घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार :-

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जी-7 में रूस को दोबारा शामिल करने की वकालत करते हुए कहा था कि यदि रूस समूह में होता तो यूक्रेन युद्ध नहीं होता। 2014 में क्राइमिया पर कब्ज़े के बाद रूस को जी-8 से बाहर किया गया था, लेकिन अब यूक्रेन के साथ संभावित शांति समझौते के ड्राफ्ट में रूस को फिर से जी-8 में आमंत्रित करने, उसके खिलाफ लगाए गए प्रतिबंध हटाने और जी-7 के ढांचे को बदलने का सुझाव शामिल है। जर्मन चांसलर ने फिलहाल इस संभावना से इनकार किया है, फिर भी अमेरिका–रूस–यूक्रेन संबंधों में यह मुद्दा प्रमुख चर्चा में है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह योजना लागू हुई तो रूस के क्राइमिया, डोनबास और अन्य कब्ज़ाए गए क्षेत्रों पर नियंत्रण को अप्रत्यक्ष मान्यता मिल जाएगी। इसी बीच रूस और अमेरिका के शीर्ष नेताओं की मुलाकातें भी चर्चा में हैं और पुतिन की विदेश नीति तथा रूस के पश्चिम विरोधी रुख पर भी सवाल उठ रहे हैं।


(२). घटनाओं और विषयों के कारण :-

रूस को जी-8 से बाहर किए जाने का मूल कारण 2014 में यूक्रेन के क्राइमिया पर रूस का कब्ज़ा था। लेकिन हाल के वर्षों में यूक्रेन युद्ध की परिस्थितियाँ, यूरोपीय देशों की सीमित क्षमताएँ, और ज़ेलेंस्की सरकार की राजनीतिक कठिनाइयाँ स्थिति को जटिल बना रही हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन की सेना कठिन दौर से गुजर रही है, अर्थव्यवस्था यूरोप पर निर्भर है और ज़ेलेंस्की का कार्यकाल भी विवादों में घिरा हुआ है। दूसरी ओर, अमेरिका और पश्चिमी देशों के भीतर यह बहस चल रही है कि रूस को अलग-थलग रखने से वैश्विक शक्ति संतुलन प्रभावित होता है। कार्नेगी मॉस्को सेंटर और अन्य थिंक टैंक मानते हैं कि रूस की मौजूदगी कई मुद्दों पर उपयोगी होती है क्योंकि वह समूह में एक “विरोधी दृष्टिकोण” लाता है। इसके अलावा नेटो के विस्तार, पश्चिमी नीतियों, और रूस में बढ़ती अमेरिका-विरोधी भावना ने बीते 20 वर्षों में रूस–पश्चिम संबंधों को लगातार तनावपूर्ण बनाया है।


(३). घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक :-

यह घटनाक्रम बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति-संतुलन, गठबंधनों और कूटनीतिक हितों का महत्व लगातार बदलता रहता है। बड़े वैश्विक समूहों से किसी देश को अलग करना या शामिल करना केवल दंडात्मक कदम नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक परिणाम उत्पन्न करता है। यूक्रेन युद्ध ने यह भी सिखाया है कि केवल सैन्य समर्थन या आर्थिक प्रतिबंध किसी संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं दे सकते; वास्तविकता, जमीनी स्थिति और सभी पक्षों की सीमाओं को समझकर ही शांति की दिशा में ठोस प्रगति हो सकती है। साथ ही यह सबक भी मिलता है कि वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए निर्णय राजनीतिक लोकप्रियता नहीं बल्कि व्यावहारिकता और दीर्घकालिक स्थिरता को ध्यान में रखकर लेने चाहिए।

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