तुर्की के दक्षिण एशियाई मुल्कों में बढ़ते क़दम से निपटने के लिए भारत क्या कर रहा है?

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:
भारत और तुर्की के संबंधों में हाल के वर्षों में बढ़ता तनाव देखा गया है। तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन खुलकर किया है और हिंद महासागर क्षेत्र में बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों में अपने प्रभाव को बढ़ाया है। मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिन का सैन्य संघर्ष हुआ, जिसमें पाकिस्तान ने कथित रूप से तुर्की से प्राप्त ड्रोन का उपयोग किया। तुर्की पाकिस्तान को एफ-16 फाइटिंग फ़ाल्कन जेट और बायरक्तार ड्रोन जैसी आपूर्ति करता रहा है और कश्मीर मुद्दे पर लगातार पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है। इसके अलावा, तुर्की ने भारत के पड़ोसी देशों के साथ अपनी सैन्य और गैर-सैन्य गतिविधियों के जरिए क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया है, जिसमें बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका शामिल हैं।


२. घटनाओं और विषयों के कारण:
तुर्की की यह सक्रियता कई कारणों से हुई है। सबसे पहले, भारत के साथ तनाव और पाकिस्तान को समर्थन देना तुर्की की रणनीति का हिस्सा है। दूसरी ओर, तुर्की दक्षिण एशिया में अपनी राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक उपस्थिति को बढ़ाना चाहता है। बांग्लादेश और मालदीव में सैन्य उपकरण और ड्रोन आपूर्ति, नेपाल में मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के लिए फंडिंग, और श्रीलंका में नौसैनिक सहयोग जैसे कदम तुर्की की बढ़ती रणनीतिक सक्रियता को दर्शाते हैं। इसके अलावा, तुर्की एशियाई देशों के साथ सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से “एशिया ए न्यू इनिशिएटिव” जैसी पहल कर रहा है, ताकि वह इस क्षेत्र में भारत और उसके साझेदारों के खिलाफ अपने प्रभाव को मज़बूत कर सके।


३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:
इस स्थिति से यह शिक्षा मिलती है कि क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय और सतत निगरानी आवश्यक है। भारत ने तुर्की के विस्तार और प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ग्रीस, साइप्रस और आर्मीनिया जैसे देशों के साथ साझेदारी को मजबूत किया है और नौसैनिक अभ्यासों के जरिए अपनी रणनीतिक तैयारी बढ़ाई है। यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय असुरक्षा और प्रतिद्वंद्विता के बीच रणनीतिक साझेदारियों और कूटनीतिक पहल का महत्व बहुत अधिक है। साथ ही, क्षेत्रीय सहयोग में निष्क्रिय रहना किसी देश के हितों के लिए खतरा बन सकता है, इसलिए सतत सक्रियता और प्रभावी कूटनीति जरूरी है।

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