भारत का सुप्रीम कोर्ट दलित अधिकारों को लेकर सचेत है लेकिन उसकी भाषा में पूर्वाग्रह- स्टडी

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१. घटनाओं और विषयों से संबंधित समाचार:

एक नई स्टडी ने यह उजागर किया है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई प्रगतिशील फैसले दिए हैं, लेकिन कई ऐतिहासिक फ़ैसलों में न्यायालय की भाषा ने अनजाने में जातिगत श्रेष्ठता या पूर्वाग्रह को भी प्रतिबिंबित किया है। 1950 से 2025 के बीच पाँच या अधिक न्यायाधीशों वाली संवैधानिक पीठों के फैसलों के विश्लेषण में पाया गया कि कई निर्णय दलित अधिकारों को मजबूत करते हुए भी ऐसी भाषा का प्रयोग करते थे जो उन्हें कलंकित या कमतर दर्शाती थी। स्टडी में जजों द्वारा दलितों की तुलना ‘साधारण घोड़ों’, ‘विकलांगता’ या ‘आदिम’ समुदायों से करने जैसे उदाहरण सामने आए। यह शोध मेलबर्न यूनिवर्सिटी के फंड से हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसमें सहयोग किया। रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि भारत की शीर्ष अदालत, जिसे दुनिया की सबसे शक्तिशाली न्यायपालिकाओं में गिना जाता है, अब भाषायी पूर्वाग्रह की समीक्षा पर ध्यान दे रही है और हाल के वर्षों में जेंडर व अन्य रूढ़ियों पर काम कर रही है।


२. घटनाओं और विषयों के कारण:

यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि न्यायालय की भाषा और उपमाएँ अक्सर उन सामाजिक धारणाओं से प्रभावित रही हैं जो भारतीय समाज में सदियों से मौजूद हैं। कई न्यायाधीश भले ही दलितों के प्रति सहानुभूति रखते हों, लेकिन उनकी भाषायी पसंद अनजाने में पुरानी जातिगत रूढ़ियों को मजबूत करती रही। शिक्षा को जाति समाप्त करने का समाधान बताने, आरक्षण को “बैसाखी” कहने, दलितों को ‘कमतर’ समूहों से तुलना करने जैसी अभिव्यक्तियाँ दर्शाती हैं कि समस्या केवल फैसलों में नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों से प्रभावित सोच में भी है। सुप्रीम कोर्ट में दलित प्रतिनिधित्व ऐतिहासिक रूप से बहुत कम रहा — अब तक केवल आठ दलित न्यायाधीश नियुक्त हुए — जिससे विविध दृष्टिकोणों की कमी और भी बढ़ गई। इसके अलावा न्यायिक भाषा की व्यापक पहुंच, उसका समाज और राजनीति पर प्रभाव, और प्रशिक्षण की कमी ने भी इन भाषायी चूकों को जन्म दिया।


३. घटनाओं और विषयों से सीखे जाने वाले सबक:

इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि न्याय केवल फैसलों से नहीं, बल्कि न्यायालय द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा से भी प्रभावित होता है। न्यायपालिका को यह समझना महत्वपूर्ण है कि शब्द और उपमाएँ समाज में धारणाएँ गढ़ते हैं और कमजोर समुदायों के प्रति सम्मान या भेदभाव को गहरा करने की क्षमता रखते हैं। इस स्टडी से सीख मिलती है कि अदालतों को आत्ममंथन जारी रखना चाहिए और भाषा को संवेदनशील, समावेशी और सम्मानजनक बनाने के लिए संस्थागत कदम उठाने चाहिए। इसके लिए न्यायपालिका में विविधता बढ़ाना, खासकर दलित और अन्य हाशिए के समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना, बेहद आवश्यक है। यह रिपोर्ट यह भी याद दिलाती है कि समानता की लड़ाई केवल कानून लिखने से नहीं जीती जाती — यह उन रूपकों, शब्दों, और सोच में बदलाव से भी लड़ी जाती है जो संस्थानों के भीतर और समाज में रोज़मर्रा की भाषा में मौजूद रहती है।

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